राजीव गांधी-छोटे से जीवन की बड़ी उपलब्धि

 आज भारत के पूर्व एवं सबसे युवा प्रधानमंत्री स्व. राजीव रत्न गांधी की पुण्य तिथि हैं। सुदर्शन एवं मर्यादित व्यक्तित्व का यकायक अवसान उनके चाहने वालों मे तब भी था और आज भी हैं।राजनीति मे उनका पर्दापण किसी हिन्दी फिल्मों के क्लाइमेक्स सीन की तरह रहा। संजय गांधी की असमय मौत ने उन्हें हवाई यात्राओं से राजनीति यात्राओं मे उतारा। तेज तर्राट मां और प्रधानमंत्री इंदिराजी के  भोले पुत्र थे राजीवजी, जो राजनीतिक दांव पेचों से पूणतया अनिभिज्ञ थे।       

 

1980 में छोटे भाई के अवसान के बाद अमेठी सीट से वे भारत की संसद मे पहुंचे।सही मायने मे उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत यही से हुई। वे कांग्रेस पार्टी के महा सचिव बनाए गए,तभी 1982 मे एशियाई खेलों का आयोजन दिल्ली मे हुआ।खेलप्रेमी राजीवजी को आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई एवं एशियाई खेलों की सफलता ने उनकी प्रंबधन क्षमता को दर्शाया। वे अपनी मां श्रीमती इंदिरा गांधी से राजनीति के गुर सीख ही रहे थे कि अपने ही अंगरक्षकों द्वारा वे शहीद हो गई। 

 

मां की शहादत और सिख विरोधी दंगों मे जलता देश, ऐसे संकट के समय मे उन्हें देश के प्रधानमंत्री का पद मिला,कांटों भरे ताज से मिली यह सत्ता इतनी आसान नही थीं। सत्ता सम्हालने के बाद भारत मे हो रहे दंगों को रोकना उनकी पहली प्राथमिकता रही,दंगे रूके लेकिन बहुत से घाव देकर।

 

इंदिराजी की शहादत ने कांग्रेस पार्टी को 1984 के आम चुनाव मे एक तरफा जीत दिलाई और राजीव गांधी ने देश की बाग डोर संभाली। वे राजनीति के न तो चाणक्य थे न शातिर खिलाड़ी,वे एक युवा राजनेता थे जो नयी पीढ़ी के लिए ऐसा कुछ करने की इच्छा रखतें थे कि उनका भविष्य बन सके। इसी सबको ध्यान मे रखते हुए उन्होंने हर क्षेत्र के महारथियों को अपने साथ जोडा़ उन्हें सलाहकार नियुक्त कर देश के क्षेत्र मे उनकी सलाह ली और  क्रियान्वित किया।


वे सूचनाप्रोधोगिकी के जनक कहे जाते है,देश मे कंप्यूटराइजेशन और टेलीकाम क्रान्ति का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता हैं। स्थानीय स्वराज संस्थाओ मे महिलाओं को तैतीस प्रतिशत आरक्षण देने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। पंचायतराज् का विस्तार भी उनके ही शासन काल मे हुआ.मतदाता की आयु भी उन्हीं के समय 21 से 18 की गई। सूचना प्रोधोगिकी मे जब अमेरिका का ही बोल बाला था राजीवजी ने भारतीय वैज्ञानिकों एवं रशिया की मदद से सुपर कंप्यूटर बताया जो आत्मनिर्भर भारत के लिए पैतीस साल पहले उठाया गया कदम था।


विरासत मे मिली ऊंची सोच हर भारतीय को उसका हक मिले इस प्रयोजन से वे एक से एक योजना ले के आए एवं व्यथित हुए जब लाल फीताशाही के चलते उनका लाभ निचले स्तर तक नहीं पहुंचा। आज दूरदर्शन को जो प्रतिष्ठा मिली वह देश के कौने-कौने मे पहुंचा उसका श्रेय भी राजीवशासन को जाता हैं। रामायण,महाभारत,चाणक्य,बुनियाद,भारत एक खोज,टीपू सुल्तान,तमस न जाने कितने  ही धारावाहिक उनके शासन मे दूरदर्शन ने दिखाए कि उनकी घुर विरोधी वर्तमान सत्ता को भी लाँक डाउन उन्हीं धारावाहिको का सहारा लेना पड़ा। आज भी 'मिले सुर मेरा तुम्हारा की 'तर्ज का सहारा ले कुछ नया  करने की कोशिश की जाती है।


इतिहास मे कुछ बातें 'कालजयी' होती हैं वे मिटाने से मिटती नहीं।राजीव गांधी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी थे, महात्मा गांधी के बाद वे एकमात्र राज नेता रहे जिन्होंने ने साबरमती से दाड़ी तक पदयात्रा की अभय होकर, वही वर्तमान प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष दांडी मेमोरियल का उदघाटन इतने सुरक्षा घेरे मे किया कि ...बस। इंदौर के 1990 के कांग्रेस के नेताओं को याद हो कि चुनावप्रचार के दौरान तपतपाती गर्मी में कैसे लौटे से अपने चेहरे को गिलाकर उसी से पानी पी अपनी प्यास बुझाई। जय,जय कारों के बीच ऐसा जन नेता सदियों मे होता हैं। जन-जन के नेता अतुलनीय विरासत के धनी भारत रत्न आ.राजीव रत्न गांधी को कोटि कोटि नमन।

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