सिंधिया पड़े नरम, बाग़ियों को छोड़ अब राज्य सभा पर अड़े

May 20, 2020

 

 

मध्य प्रदेश की राजनीति में नए दौर के दल बदलू नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, व उनके आगे नतमस्तक 22 समर्थक पूर्व विधायक तथाकथित जनसेवक और आँख बंद कर चलने वाले करीब 200 कार्यकर्ताओं को अब भाजपा के चक्रव्यूह के आगे हर मानना पड़ी है। जो बागी पूर्व विधायक कल तक हर हाल में विधानसभा चुनाव लड़ने की ताल ठोक रहे थे आज उनके सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं, वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया भी ठन्डे पड़ गए है, वे अब बीजेपी और आरएसएस की शर्तों पर हामी भरते नज़र आ रहे हैं।

 

आगामी विधानसभा उपचुनाव को लेकर किये गए बीजेपी के आंतरिक सर्वे ने तो सिंधिया की पूरी बाज़ी ही पलट कर रख दी है। सर्वे के अनुसार जहां 19 सीटों पर बागियों की पराजय निश्चित है, वहीं तीन सीटों पर भी कांटे का मुकाबला देखने को मिलेगा। खरीद-फरोख्त के अतिरिक्त दो सदस्यों की मृत्यु के कारण खाली हुयी सीट जौरा और आगर को तो पहले ही कांग्रेस की पक्की सीट माना जा रहा था, और अब इनके साथ 19 सीट और जुड़ने से कांग्रेस का पक्ष जहाँ बेहद मजबूत हो चुका है, वहीं बीजेपी के सामने कुआं और खाई में से किसी एक को चुनने का संकट चल रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए इन 22 बागियों का टिकट कटना उनकी राजनीतिक सौदेबाजी की कीमत का शून्य होने जैसा है परन्तु यदि टिकट नहीं कटता है तो बीजेपी सरकार का भविष्य शून्य होना निश्चित है।

 

बीजेपी संगठन और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच बागियों को टिकट नहीं देने के सम्बन्ध में तीन दौर की बातचीत हो चुकी है और बहुत जल्द इसकी औपचारिक घोषणा भी कर दी जायेगी। दोनों के बीच तय फ़ॉर्मूले के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया के राज्यसभा जाने और उनके केंद्र में मंत्री बनने के मार्ग में इससे कोई रुकावट नहीं आयेगी, और अब जल्द ही सिंधिया केंद्र में मंत्री भी बन जायेंगे।

 

मध्य प्रदेश की सरकार में शामिल सिंधिया समर्थकों की बात करें तो इस तय फ़ॉर्मूले का सर्वाधिक प्रभाव इन बागियों पर ही पड़ने वाला है। फ़ॉर्मूले के अनुसार जो दो सिंधिया समर्थक मंत्री बन चुके हैं उनके विभाग बदलकर उन्हें कमजोर विभाग दिए जायेंगे वहीं 10 बागियों को मंत्री बनाने व सभी को टिकट देने की शर्त भी अब नहीं मानी जायेगी। सूत्र बताते हैं कि इस फ़ॉर्मूले पर बातचीत करने के लिए बीजेपी संगठन की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और वरिष्ठ नेता प्रभात झा तथा सिंधिया प्रतिनिधि के तौर पर मंत्री तुलसी सिलावट और गोविन्द राजपूत को अधिकृत किया गया था जिनके बीच अब तक दो दौर की बातचीत एवं शिवराज और सिंधिया के बीच अंतिम दौर की बातचीत भी हो चुकी है, लेकिन अभी तक बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व से इस फ़ॉर्मूले को मंजूरी नहीं मिली है।

 

इस अनैतिक और खरीद-फरोख्त की राजनीति का अंजाम चाहे जो कुछ भी हो पर अगले कुछ महीनों तक मध्यप्रदेश का सियासी पारा इसी तरह से चढ़ता-उतरता रहेगा और सिंधिया समर्थक बागी फुटबॉल की तरह इस तरफ से उस तरफ और उस तरफ से इस तरफ लुढ़कते आते-जाते नजर आयेंगे।

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