शहीदों को प्रणाम, आतंकिस्तान की नींद हराम

 

आज पूरा विश्व कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहा है। मानव जीवन संकट में है। संकट के इस दौर में भारत विश्व बंधुत्व के अपने मानवतावादी चरित्र के अनुकूल आस-पड़ोस सहित पूरे विश्व में समन्वय को बढ़ावा दे रहा है। भारत ने जहां कई देशों के साथ अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता को साझा किया है, वहीं अपनी जरूरतों के बावजूद 123 से अधिक देशों को चिकित्सा आपूर्ति सुनिश्चित की है। लेकिन संकट के इस दौर में भी पाकिस्तान अपनी अमानवीय हरकतों से बाज नहीं आ रहा। कोरोना से लड़ाई में पाकिस्तान ने अपने नागरिकों को मरने के लिए तो छोड़ ही दिया है, वहींआतंकवाद फैलाने की अपनी हरकत से भी बाज नहीं आ रहा है। शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से जूझ रही है तब कुछ लोग आतंकवाद का वायरस फैला रहे हैं'।


3 मई को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा में आतंकियों से लोहा लेते हुए सेना की 21 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल आशुतोष शर्मा समेत 5 जवान शहीद हो गए। शहीद होने वालों में कर्नल आशुतोष शर्मा के अलावा, मेजर अनुज सूद, नायक राजेश कुमार, लांस नायक दिनेश सिंह और जम्मू कश्मीर पुलिस का सब इंस्पेक्टर शकील काजी शामिल हैं। वहीं 4 मई को हंदवाड़ा में हुए एक और आतंकी हमले में सीआरपीएफ के तीन जवान शहीद हो गये। गौरतलब है कि सेना ने जम्मू-कश्मीर में पांच साल बाद आतंकी मुठभेड़ में कोई कमांडिंग ऑफिसर खोया है।


पाकिस्तान भारत से पूर्व में चार-चार युद्धों में मुंह की खा चुका है। अभी हाल में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद जरूर शांति रही। लेकिन पाकिस्तान की हरकतें फिर से बढ़ गई हैं। 30 मई 2019 से लेकर 20 जनवरी 2020 तक सीजफायर उल्लंघन की 2335 घटनाएं हुई हैं। लेकिन इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह तक सीजफायर उल्लंघन की 1200 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। कोरोना वायरस संकट शुरू होने के बाद ऐसी घटनाओं में और तेजी आई। जनवरी में ऐसी घटनाएं 367 थीं, फरवरी में 366 हुईं, मार्च में इसकी संख्या बढ़कर 411 हो गईं, और अप्रैल के पहले सप्ताह तक 60 से अधिक सीजफायर उल्लंघन की घटनाएं हो चुकी थीं। लेकिन हंदवाड़ा की घटना ने एक बार फिर पूरे देश को आक्रोशित कर दिया है। देश एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की बात कर रहा है। देश का सैनिक मन-मस्तिष्क से सदैव इसके लिए तैयार रहता है। परिवार, समाज, राष्ट्र सब उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े होते हैं।


भारतीय सैनिकों की शहादत की लंबी और गौरवपूर्ण गाथा है। आजादी के बाद भारत ने पाकिस्तान को चार बार हराया है, 1948, 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध में। भारत माता की रक्षा करते हुए आजादी से लेकर अब तक देश के 35 हज़ार से अधिक सैनिक शहीद हुये हैं। आजादी के बाद पहले और 1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 1500 से अधिक सैनिक शहीद हुए थे। वहीं 1962 के भारत-चीन युद्ध में देश के 1383 सैनिक शहीद हुए थे। 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में क्रमशः 2,862 और 2,998 सैनिक शहीद हुए थे। वहीं 1999 के कारगिल युद्ध में देश के 527 सैनिक शहीद हुये थे। भारतीय सेना का एक जवान हर तीसरे दिन शहीद होकर भारत माता को अपना सर्वोच्च बलिदान देता है। एक-एक शहीद अपनी शहादत से भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परंपरा के मस्तक को ऊंचा करता है।


हमें यहां समझना होगा कि जब कोई सेना में भर्ती होता है तो उसके मन-मस्तिष्क में वतन होता है, वेतन नहीं। वतन की रक्षा के लिए अगर शहीद भी होना पड़े तो वे पीछे नहीं हटते। परिवार की सहमति से सेना में जाता है और सैनिक बनता है। परिवार को आश्वस्त करके जाता है कि स्वयं मिट भी जाऊं, लेकिन वतन पर आंच नहीं आने दूंगा। सैनिक अपनी जन्म देने वाली मां को कहता है कि 'मैं भारत माता की रक्षा करने जा रहा हूं, तेरी रक्षा परिवार करेगा, समाज करेगा, पूरा राष्ट्र करेगा’। मां का आशीर्वाद लेकर निर्दोष मन से सीमा पर मातृभूमि की रक्षा के लिए चला जाता है। लक्ष्य में 'भारत माता जिंदाबाद' और 'तिरंगा' होता है। मौत का डर नहीं होता। आंखों में सिर्फ भारत माता का चेहरा होता है। वह भारत और भारतीयों की रक्षा के लिए हर क्षण लड़-मरने को तैयार होता है। 'वंदे मातरम' सुनते ही वह रोमांचित हो जाता है। गांव का कोई व्यक्ति जब सेना में जाता है तो पूरे क्षेत्र में चर्चा होती है। उस परिवार की चर्चा होती है। उस परिवार को गर्व होता है। हर सैनिक को यह गर्व होता है कि पूरा भारत उसके साथ है। उसका परिवार, उसका समाज सब उसके साथ है।


जम्मू और कश्मीर के हंदवाड़ा एनकाउंटर में 3 मई को शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा की पत्नी श्रीमती पल्लवी शर्मा कहती हैं, 'मुझे गर्व है कि पति देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए। उनकी शहादत पर आंसू नहीं बहाऊंगी। देश के लिए कुर्बान होना सम्मान की बात है, यह उनका फैसला था, इसका पूरा सम्मान करूंगी'। वे यह भी कहती हैं, 'हमें उन पर गर्व है। उनकी यूनिट उनके लिए प्राथमिकता थी और वह उनका जुनून था। उनकी जगह हमारी जिंदगी में कोई भर नहीं सकता और उनका जाना हमारे लिए एक कभी न पूरा होने वाला नुकसान है। लेकिन उन्होंने अपने जवानों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जो किया, उस पर मुझे गर्व है।' कुपवाड़ा के हंदवाड़ा में ही वतन की रक्षा करते हुए शहीद हुए जवान अश्वनी कुमार यादव के पार्थिव शरीर को उनके चार साल के बेटे ने मुखाग्नि दी जबकि छह साल की बेटी ने अंतिम सलामी दी।


28 जून 1999 को कारगिल युद्ध में शहीद हुए मेजर पद्मपानी आचार्य की मां ने उनकी शहादत पर कहा था, 'एक मां के रूप में, मैं निश्चित रूप से दुखी होती हूं, लेकिन एक देशभक्त के रूप में, मुझे अपने बेटे पर गर्व है। मैं शायद जीवित न रहूं लेकिन वह हमेशा जीवित रहेगा। उसने मुझे वादा लिया था कि उसके शहीद होने पर मैं रोउंगी नहीं।‘ शहादत की ऐसी अनेकों प्रेरणास्पद कहानियां हैं और ये सहज नहीं हैं। यह शोध का विषय है कि शहीदों की शहादत के बाद दुःख होना स्वाभाविक है , लेकिन मातम नहीं होता आज भारत में युद्ध विधवा का जो सम्मान है, दुनिया में कहीं नहीं है। उन्हें श्रद्धा, पवित्रता और सम्मान के साथ देखा जाता है। गांव, समाज, राष्ट्र सभी सम्मान से देखते हैं। उनका दुःख देश अपना दुःख समझता है।


शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा की पत्नी पल्लवी शर्मा ने जो कहा, शहीद मेजर पद्मपानी आचार्य की मां ने जो कहा, शहीद सैनिक अश्वनी कुमार यादव की छह साल की बेटी ने जो व्यक्त किया, वह नारी एवं दैवीय शक्ति की अभिव्यक्ति है। पूरे देश ने देखा, उनके चेहरे पर यह शक्ति साफ़ झलक रही थी। न बच्चे को रोने दिया, न स्वयं रोया। यह सहज घटना नहीं है। यह है भारतीय सेना और उसके परिवार का चरित्र। भारत का मस्तक ऊंचा रहे, इसके लिए सैनिक ही नहीं उसका परिवार भी त्याग के लिए तैयार रहता है। अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए नहीं, मातृभूमि की रक्षा के लिए सैनिक बनते हैं। माटी का कर्ज उतारने के लिए शहीद की माता जोर देकर कहती है कि 'मेरा दूसरा बेटा भी देश के लिए शहीद होगा तो मुझे गर्व होगा'। मौत की जिंदगी जीने का अदम्य साहस भारत की मिट्टी में ही है, यह दुनिया के किसी देश में संभव नहीं है। आतंकिस्तान रूपी पाकिस्तान को इसकी कल्पना भी नहीं होगी।


आज का भारत 1962 वाला नहीं है। स्थितियां बदल गई है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अगर दुनिया ने भारतीय सेना के मानवीय चेहरा को देखा तो बालाकोट का वज्र प्रहार भी। पाकिस्तान द्वारा भारत के जांबाज अभिनंदन को सौंपा जाना कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह सिर्फ अभिनंदन का अभिनंदन नहीं था, भारत के एक-एक नागरिक का अभिनंदन था। पाकिस्तान जानता था अगर अभिनंदन को कुछ होता तो भारत की सेना रावलपिंडी तक पहुंच जाती। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रखर नेतृत्व है, जिनका लोहा दुनिया मानती है। महिला रक्षा मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण पायलट का सूट पहनकर और कॉकपिट में बैठकर वायुसेना के लड़ाकू विमान सुखोई 30 एमकेआई में उड़ान भरती हैं तथा युद्ध तैयारियों और क्षमताओं की समीक्षा करती हैं। वहीं वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह फ्रांस में राफेल विमान की शस्त्र पूजा करते हैं और उस पर 'ॐ' लिखकर कलेवा बांधते हैं। ‘वन रैंक वन पेंशन’ हो, शहीदों के पार्थिव शरीरों को गांव पहुंचाना हो, मृतकों के परिवार के कल्याण की बात हो, शहीद कोष या फिर वार मेमोरियल का निर्माण, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मां भारती के लिए लड़ने वालों एवं शहीदों के सम्मान और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए अनेकानेक निर्णय लिए हैं।


लगभग 14 लाख सेना के साथ भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति वाला देश है। सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन भारत से आगे है। वह दिन दूर नहीं जब सैन्य शक्ति के मामले में भारत चीन से भी आगे निकल जाएगा। 1965 और 1971 के युद्ध के बाद सैन्य बलों में एकीकृत कमान की जरूरत महसूस की गई। लेकिन कारगिल युद्ध के बाद इस पर गंभीरता से विचार किया गया। 2001 में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में बनाए गये मंत्रियों के समूह ने भी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की सिफारिश की थी। 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की घोषणा की गई। इसके गठन के साथ ही भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा के मायने बदल गए हैं।


देश की सेना को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार लगातार काम कर रही है। रक्षा बजट बढ़ाने को लेकर नरेंद्र मोदी कितने गंभीर हैं, यह 2020 के बजट से पता चलता है। 2020 के बजट में रक्षा बजट में 6 प्रतिशत की बढोतरी की गई है। यह अब 3.37 लाख करोड़ हो गया है। पिछले साल तक यह 3.18 लाख करोड़ रुपये था। वहीं रक्षा क्षेत्र में दी जानेवाली पेंशन को जोड़ लें तो यह 4.7 लाख करोड़ हो गया है। भारतीय सेना की शक्ति को आज वैश्विक पटल पर सम्मान भी दिया जा रहा है। एक ऐसी सेना जो शांति की स्थापना के लिए हथियार उठाती है। भारत वो देश है, जिसने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के निमित्त 70 में से 50 बड़े मिशनों में अपने दो लाख से ज्यादा सैनिक भेजे हैं। भारत वो देश है, जिसके सबसे ज्यादा सैनिक इन शांति अभियानों में शहीद हुए हैं।


आतंकवाद पर नरेंद्र मोदी सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' की नीति है। यही कारण है कि 2014 से 2019 के बीच सुरक्षाबलों के अभियानों में 998 आतंकवादी मारे गए। 2012 और 2013 में क्रमशः 50 और 67 आतंकवादी मारे गए थे। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद 2014 में यह संख्या 110, 2015 में 108, 2016 में 150, 2017 में 213, 2018 में 257 और 2019 में 160 हो गई। वहीं 2020 के केवल चार महीनों (जनवरी-अप्रैल) में आतंकी संगठनों के कई शीर्ष कमांडरों सहित 50 आतंकवादी मारे गए हैं। सितंबर 2016 में भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था और आठ आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया था। फरवरी 2019 में भारतीय सेना द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर के बालाकोट में किये गए एयर स्ट्राइक से कई आतंकी शिविर नष्ट कर दिए गए, वहीं सैकड़ों की संख्या में आतंकवादी मारे गए।


पाकिस्तान (आतंकिस्तान) भारत के सब्र की परीक्षा न ले। गिलगित-बलूचिस्तान और सिंध में भारत के बिना उकसाये क्या स्थिति है, दुनिया जानती है। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव की जब सरकार थी, उस दौरान 22 फरवरी,1994 को संसद के दोनों सदनों ने ध्वनिमत से यह प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। हाल ही में भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा है कि 'जहां तक पाक अधिकृत कश्मीर का प्रश्न है, संसद ने बहुत साल पहले प्रस्ताव पारित कर दिया था। अगर संसद चाहती है कि पाक अधिकृत कश्मीर हमारा हो और अगर आदेश मिलता है तो निश्चय ही उस पर कार्रवाई की जाएगी'। लेकिन यह संयम भारत जैसा उदार देश ही दिखा सकता है।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व सांसद है, वर्तमान में भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload