आदिवासी अंचल का सर्वमान्य नेता - हर्षविजय

May 6, 2020

आदिवासी अंचल सैलाना में बिना लाग लपेट सक्रिय है ये युवा विधायक 

 

बीता ज़माना था जब लोग राजनीति में जनसेवा करने जाते थे, गाँधी-नेहरू-शास्त्री-पटेल को बचपन से हम सबने पढ़ा और समझा है. समय बदला, लोग बदले बदल गई पूरी राजनीति, वर्तमान में बदले की राजनीति हावी हो चली है. सैकड़ो बांध, विदेशी संधिया, बिजली, सड़के आदि देने वाले नेहरू अब हर काम में रुकावट बन चले है. वर्तमान राजनीति के हिसाब से नेहरू-गाँधी-शास्त्री-पटेल के दशकों पूर्व लिए फैसले अब जाकर विषम परिणाम दे रहे है. 

 

समय के साथ राजनीति में जाने की भावना में परिवर्तन हुआ और राजनीति करने का लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना और सत्ता सुख लेना हो गया. अब राजनीति जनसेवा का माध्यम नही रह गया, जनता भी चुनाव में आशान्वित होते हुए अपने नेता को चुनने जा रही ही हैं और हर बार ठगी जा रही हैं. लेकिन इस मर्तबा रतलाम जिले की सैलाना विधानसभा में कुछ सुखद नजारा है, यहाँ का युवा विधायाक हर्ष विजय गहलोत "गुड्डू" लोगों के बीच ही है, और यह विश्वास दिलाने समर्पित है की आपने मुझे एक मौका दिया अब मैं आपकी सेवा करने में पीछे नहीं रहूँगा. विगत चुनाव में सैलाना विधानसभा की जनता ने इस हँसमुख चेहरे पर विश्वास जताया और 28 हज़ार मतो से जिताया भी। जब से गहलोत विधायक चुने गए तब से ही सैलाना की जनता यह महसूस करने लगी कि विधायक को चुनने में कोई भूल नहीं हुई क्योकि जो कोई भी गहलोत के पास अपना काम लेकर गया तो गहलोत ने उसे निराश नहीं किया। किसी भी नेता की यही खूबी जनता को भाति है एवं नेता पर फबती भी है. सैलाना में आलम है की समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी बेधड़क होकर विधायक निवास पर जाने लगा और विधायक ने भी किसी व्यक्ति को यह अहसास नहीं होने दिया कि वे विधायक के पास आया हैं. हर्ष गहलोत ने उम्र में बड़े लोगो से बेटा तो हम उम्र लोगो से मित्र की तरह व्यवहार करते है. 

 

पुराने रहवासियों की माने तो हर्ष विजय में उनके पिता स्वर्गीय प्रभुदयाल गहलोत की छवि झलकती है. उल्लेखनीय है उनके दिवंगत पिता सात बार विधायक रहे है एवं जनसेवा ही उनका परम कर्त्तव्य-धर्म था. वर्ष 2016 में स्वर्गीय प्रभुदयाल गहलोत साहब से उनके निवास की पहली मंज़िल पर एक संक्षिप्त भेंट आज भी याद है, वही अक्खड़ अंदाज़ में निवास में स्वागत कर फोर स्क्वायर जलाते हुए, अपने सहयोगी को चाय का बोलकर बेहद आत्मीयता हमे सुना। तत्समय हर्ष विधायक नहीं थे, व अपने पेट्रोल पंप पर थे, तो स्वर्गीय प्रभुदयाल गहलोत साहब के साथ कुछ समय बिताने को मिला। गेहलोत साहब ने बातो ही बातो में बताया की तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा जी ने नौकरी छुड़ा कर चुनाव लड़वाया था, बमुश्किल बहुत ही सीमित संसाधनों में चुनाव लड़ा, व आदिवासी अंचल का प्रतिनिधित्व पाया. विधायक के पूर्व स्वर्गीय प्रभुदयाल गहलोत साहब स्कूल में शिक्षक हुआ करते थे.  इस तथ्य में कोई दो राय नहीं की स्वर्गीय प्रभुदयाल गहलोत साहब तत्कालीन मुट्ठी भर पढ़े लिखे विधायकों  में से एक थे. बहरहाल समय बीता आज वे हमारे बीच नहीं है, आज उनके पुत्र हर्ष विधायक है. 

 

युवा विधायक हर्ष ने जनसेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी है, आधी रात को आकर किसी व्यक्ति ने दरवाज़ा खटखटाया तो उन्होने लेश मात्र भी शिकवा न करते हुए उसका काम किया, जहा एक ओर भगवा राशन पैकेट या मोदी किट प्रचलित है, इस युवा ने बीते वक्त में सैकड़ो मास्क, सैनिटाइज़र व अन्य रहत सामग्री बिना ब्रांडिंग के बांटी है। हालांकि आदिवासी अंचल में ब्रांडिंग का कोई खास प्रभाव भी नहीं है, पर रतलाम-झाबुआ के चुने हुए संसद महोदय सूबे से गायब से है। अब जब देश और दुनिया कोरोना के संकट से जूझ रही है तो हर्ष विजय जनता से किया हुआ अपना वचन निभाने उनकी सेवा करने में दिन रात एक किए हुए है. हज़ारों आदिवासी मजदूरों को उनके घर पहुँचाना हो या हज़ारों गरीबो को रोज़ खाना बाँटना हो विधायक ने हर काम बखूबी निभाया है. 

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