नारद जयंती 2020 : दिव्य गुण संपन्न देवर्षि नारदजी

May 1, 2020

 

नारद जयंती हर साल हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाई जाती है। देवर्षि नारद भगवान श्री हरी विष्णु के अनन्य भक्त है, नारद मुनि के पिता ब्रह्राजी है। नारद मुनि हमेशा तीनो लोकों में भ्रमणकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। नारद मुनि का आदर सत्कार न केवल देवी-देवता, मुनि किया करते थे बल्कि असुरलोक के राजा समेत सारे राक्षसगण भी उन्हें बराबर सम्मान दिया करते थे। 

 

अमूमन देवर्षि नारद नाम सुनते ही इधर-उधर विचरण करने वाले व्यक्तित्व की अनुभूति होती है। अनेको धार्मिक धारावाहिको के कारन आम मानस के मन में देवर्षि नारद 'इधर की उधर' करते रहते हैं,उन्हें चुगलखोर के रूप में जानते हैं। लेकिन यथार्थ कुछ और है, मेरा मतानुसार यदि देवर्षि नारद इधर-उधर घूमते हुए संवाद-संकलन का कार्य करते हैं। इस प्रकार एक घुमक्कड़, किंतु सही और सक्रिय-सार्थक संवाददाता की भूमिका निभाते रहे हैं और अधिक स्पष्ट शब्दों में दिव्य पत्रकार हैं ।

 

पुराणों के अनुसार महर्षि वेदव्यास विश्व के पहले संपादक हैं- क्योंकि उन्होंने वेदों का संपादन करके यह निश्चित किया कि कौन-सा मंत्र किस वेद में जाएगा यह वेद के संपादन कार्य महाभारत के लेखन से भी अधिक कठिन और महत्वपूर्ण था। देवर्षि नारद दुनिया के प्रथम पत्रकार या पहले संवाददाता हैं, क्योंकि देवर्षि नारद ने इस लोक से उस लोक में परिक्रमा करते हुए संवादों के आदान-प्रदान द्वारा पत्रकारिता का प्रारंभ किया। अतः देवर्षि नारद पत्रकारिता के प्रथम पुरुष/पुरोधा पुरुष/पितृ पुरुष हैं। वे इधर से उधर घूमते हुए संवाद सेतु बनाते हैं। 

 

देवर्षि नारद इस लोक से उस लोक मे घूमना पड़ता है तो इसमें संवाद की जो अदला-बदली हो जाती है उसे लोगों ने नकारात्मक दृष्टि से देखा और नारद को 'भिड़ाने वाले' या 'कलह कराने वाले' किरदार के फ्रेम में फिट कर दिया। नारद की छवि को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि वे 'चोर को कहते हैं कि चोरी कर और साहूकार को कहते हैं कि जाग।' लेकिन यह सच नहीं है। सच तो यह है कि नारद घूमते हुए सीधे संवाद कर रहे हैं और सीधे संवाद भेज रहे हैं इसलिए नारद सतत सजग-सक्रिय हैं यानी नारद का संवाद 'टेबल-रिपोर्टिंग' नहीं 'स्पॉट-रिपोर्टिंग' है इसलिए उसमें जीवंतता है।

 

मान्याताओं के अनुसार देवर्षि नारद सृष्टि पहले ऐसे संदेश वाहक यानी पत्रकार थे जो एक लोक से दूसरे लोक की परिक्रमा करते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया करते थे। वह हमेशा तीनों लोकों में इधर-उधर भटकते ही रहते थे। उनकी इस आदत के पीछे भी कथा है। दरअसल राजा दक्ष की पत्नी आसक्ति से 10 हजार पुत्रों का जन्म हुआ था लेकिन नारद जी ने सभी 10 हजार पुत्रों को मोक्ष की शिक्षा देकर राजपाठ से वंचित कर दिया था। इस बात से नाराज होकर राजा दक्ष ने नारद जी को श्राप दे दिया कि वह हमेशा इधर-उधर भटकते रहेंगे और एक स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएंगे।

 

पिता के श्राप से रहे अविवाहित

 

शास्त्रों के अनुसार ब्रह्रााजी ने नारद जी से सृष्टि के कामों में हिस्सा लेने और विवाह करने के लिए कहा, लेकिन नारद जी ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने से मना कर दिया। तब क्रोध में ब्रह्रााजी ने देवर्षि नारद को आजीवन अविवाहित रहने का श्राप दे डाला।


 

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