भाजपा के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंसे महाराज

April 20, 2020

 

कांग्रेस के बागी पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, भाजपा के चक्रव्यूह में बुरी तरह से फंस गए हैं। भाजपा के पिजड़े में कैद होकर अब उनके पास सिवाय फड़फड़ाने के और कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने अपने समर्थक विधायकों का विधानसभा से इस्तीफा कराकर और उन्हें भाजपा में शामिल कराकर स्वयं के पैर में जो कुल्हाड़ी मारी थी। उसका दर्द अब उन्हें महसूस हो रहा है। भाजपा ने कमलनाथ की सरकार को गिराने के लिए सिंधिया और उनके समर्थकों की जो बारात थी। उसकी खूब आवभगत की। उन्हें पर्याप्त दहेज भी दिया। सत्ता में भागीदारी का भी भरोसा दिलाया। स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा का चुनाव जिताकर केंद्रीय मंत्री बनाने का जो भरोसा दिलाया था। उसमें महाराज और उनके समर्थक भाजपा के बिछाए हुए जाल (चक्रव्यूह) में आसानी से फंस गए।


कमलनाथ की सरकार गिराने के लिए और सिंधिया समर्थकों को भरोसा दिलाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा स्वयं बेंगलुरु एयरपोर्ट पहुंचे थे। कांग्रेस छोड़ने और विधायकी से इस्तीफा देने पर उन्हें मंत्री एवं निगम-मंडल का अध्यक्ष बनाने, उप चुनाव लड़ने के लिए दहेज के रूप में नगदी देकर, सबके इस्तीफे करा लिए। भाजपा ने कमलनाथ सरकार गिराने की जो बिसात बिछाई थी, उसमें वह पूर्णता सफल रही। 20 तारीख को कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 23 मार्च को मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह की शपथ हो गई। भाजपा ने महाराज और उनके समर्थकों की आंखों में सत्ता सुंदरी और वैभव की जो पट्टी बांधी थी। अब उसकी हकीकत सामने आ गई ई। सिंधिया महाराज और उनके समर्थकों को अपनी गलती का अब एहसास हो रहा है।


 

शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बने हुए 25 दिन से ज्यादा का समय हो गया है । राज्यसभा का चुनाव भी टल गया है। मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल का गठन अभी तक नहीं हुआ है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है । कोरोना वायरस की आड़ में भाजपा ने जो राजनीति शुरू की थी। उसमें विधायक दल का नेता चुनने तथा राज्यपाल के पास भाजपा विधायकों की ,परेड कराने तक कोरोनावायरस का कोई संक्रमण नहीं था। भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य विधायक राजनीतिक उठापटक के चलते सब राजधानी भोपाल में ही थे। इसके बाद भी 26 मार्च को राज्यसभा के लिए जो मतदान होना था। चुनाव आयोग ने उसे टाल दिया । मध्यप्रदेश में शिवराज की सरकार बनने के 2 दिन बाद पूरे भारत में 21 दिन का लॉकडाउन 25 मार्च को लागू किया गया। मध्य प्रदेश की राजनीतिक उठापटक के कारण अन्य राज्यों में जहां राज्यसभा का मतदान होना था। वहां पर भी मतदान टाल दिया गया। बागी ज्योतिरादित्य सिंधिया अभी राज्यसभा जाने से लटक गए। वही उनके समर्थक मंत्री और विधायक जिन्होंने इस्तीफे दिए थे। जो तुरंत मंत्री बनने जा रहे थे। 25 दिन बाद भी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जा रहा है। जिसके कारण सिंधिया और उनके समर्थक विधायक अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं । जिन सिंधिया समर्थक विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दिया है। वह लगातार सिंधिया पर दबाव बना रहे हैं। भाजपा ने मंत्रिमंडल गठन को लेकर चुप्पी साध रखी थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया को स्वयं चल कर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के पास जाना पड़ा। उन्होंने महाराज को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने के लिए सलाह दे दी। सिंधिया जी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा जी से भी मिले । उन्होंने प्रथम चरण में 12 मंत्रियों को शपथ दिलाने का प्रस्ताव सिंधिया के सामने रखा। इसमें तीन मंत्री सिंधिया गुट के और दो मंत्री बागी कांग्रेसी विधायक शेष मंत्री भाजपा के कोटे से बनना थे। सिंधिया महाराज इस प्रस्ताव से भड़क गए जिससे  भाजपा ने मंत्रिमंडल का विस्तार टाल दिया। अब महाराज के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो भाजपा हाईकमान द्वारा दिए गए वादों को जल्द पूरा करने के लिए वह दबाव बना सकें। 


भाजपा सूत्रों के अनुसार 22 सीटों के उपचुनाव को लेकर भाजपा के ऊपर जो दबाव था । उसके लिए भाजपा संगठन ने उपचुनाव के पूर्व सभी सीटों पर सर्वे कराया है। जिस तरह की रिपोर्ट प्राप्त हुई है। उसके अनुसार सिंधिया समर्थक विधायकों को यदि पुनः टिकट दी जाती है। ऐसी स्थिति में एक दर्जन सीटें ही भाजपा जीत पाएगी। इनके स्थान पर यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को टिकट देगी तो लगभग 18 सीटों पर जीतने की संभावना सर्वे में आई है। ऐसी स्थिति में भाजपा ने जानबूझकर केंद्र एवं राज्य में सिंधिया को ढीला छोड़ दिया है। ताकि उनकी आक्रामकता में धीरे-धीरे कमी आ सके।


ज्योतिरादित्य सिंधिया जो तेवर कांग्रेस में रहकर दिखाते थे। भाजपा नेताओं के सामने उनके इस तेवर पर कोई असर नहीं हो रहा है। सरकार गिरने और सिंधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफे देने के बाद सिंधिया के पास अब तुरुप का कोई पत्ता शेष नहीं बचा है। ऐसी स्थिति में वह राज्यसभा सदस्य बनने और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के रहमों करम पर हैं। अब वह भाजपा छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकते हैं।
सिंधिया ने पिछले 3 दिनों में भाजपा हाईकमान पर काफी दबाव बनाने का प्रयास किया। किंतु वह काम नहीं आया। भाजपा ने मंत्रिमंडल का विस्तार टालकर महाराज को संकेत दे दिया है कि यदि वह नहीं माने तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह 26 अप्रैल तक अपने हिसाब से मंत्रियों को शपथ दिला देंगे। भाजपा सूत्रों की माने तो कमलनाथ सरकार गिराने का जो प्रयास भाजपा ने किया था। उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायक इतनी गलती करेंगे। इस पर उन्हें आश्चर्य है भाजपा का यह भी कहना है कि इस्तीफा देने वाले विधायकों ने उपचुनाव के नाम पर पूरी कीमत वसूल कर ली है । ऐसी स्थिति में यदि वह भाजपा के साथ सहयोग करेंगे और भाजपा की बात को मानेंगे। तभी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। सर्वे में इस्तीफा देने वाले बागी विधायकों की जो रिपोर्ट सामने आई है। उसके अनुसार इस्तीफा देने वाले विधायकों का उनके ही क्षेत्र में भारी विरोध हो रहा है। भाजपा यदि उन्हें टिकट देगी. तो भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ सकता है। भाजपा सूत्रों के अनुसार अगस्त अथवा सितंबर माह में उपचुनाव होंगे। ग्वालियर, चंबल संभाग में भाजपा पहले से ही काफी मजबूत है । ऐसी स्थिति में यदि महाराज नाराज भी हो जाते हैं। तो भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा। उल्टे सिंधिया और उनके समर्थकों की नाराजी से भाजपा को फायदा ही होगा वर्तमान स्थिति में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके इस्तीफा देने वाले समर्थक । विधायक पिजड़े में कैद होकर रह गए हैं। 


पिंजड़े में फड़फड़ाने के अलावा अब उनके पास कोई अन्य विकल्प पर भी नहीं रहा है। भाजपा सूत्रों की माने तो सिंधिया जिस तरह से भाजपा में अपना वर्चस्व बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वह भाजपा में संभव नहीं है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा के तौर तरीके सीखने होंगे। पार्टी के अनुशासन मे रहना होगा। तभी भाजपा में वह आगे की राजनीति कर सकते हैं।

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