सत्ता के लालची गंगापुत्रों ने ली एक तपस्वी-गंगापुत्र की जान

October 12, 2018

* वर्त्तमान भगीरथ थे प्रोफेसर साहब
* अब गंगा की बात क्यों नहीं हो रही,  विज्ञापन भी नदारद है, मंत्रियों के ट्वीट भी नहीं आ रहे, देश ने महान पर्यावरणविद खो दिया बस खबर बन जाएगी, और समय के गर्भ में समा जाएगी 


 

 

माँ गंगा सफाई के मुद्दे 22 जून से अनशन पर बैठे पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल का निधन हो चुका है। इस वक़्त उन्हें अब हरिद्वार से दिल्ली लाया गया है जहां  अंतिम संस्कार को लेकर ऋषिकेश के एम्स और मातृसदन के बीच खींचतान शुरू हो गई है। एम्स का कहना है कि प्रो जीडी अग्रवाल अपना शरीर एम्स को दान कर चुके थे, इसलिए उनका शरीर एम्स में ही रहेगा। वहीं मातृसदन उनके शव को आश्रम में रखने की मांग कर रहा है। मातृसदन की मांग है कि तीन दिन के लिए जीडी अग्रवाल के पार्थिव शरीर को आश्रम में रखा जाए, ताकि लोग उनका अंतिम दर्शन कर सकें। 


आईआईटी में प्रोफेसर रह चुके जीडी अग्रवाल लम्बे वक़्त से गंगा सफाई की मांग रहें मगर किसी सरकार ने उन्हें गंभीरता नहीं लिया और अनशन पर बैठे रहे। उसपर से उनपर BJP सरकार की पुलिस का अत्याचार भी देखा गया था।

 

इस मामले पर सामाजिक कार्यकर्ता और कवि कुमार विश्वास ने दुःख ज़ाहिर करते हुए सरकार पर आक्रोश जताया। विश्वास ने सोशल मीडिया पर लिखा- निकम्मे वक़्त और बेशर्म मुद्दों के शोर में एक तपस्वी-साधक की चुपचाप विदाई।

 

माँ गंगा की क़समें खाने वालों को लिए, आमागी चुनावों में सत्ता तक पहुँचाने वाले कीचड़ से सने मुद्दे ज़्यादा मुफ़ीद है। बेहया नेताओं द्वारा अपहृत,भारतीय राजनीति के सबसे ख़राब दौर ये हमारी बेबसी का घोष है।

 

स्वर्गीय जीडी अग्रवाल आईआईटी कानपुर में सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख रहे थे। उन्होंने राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण का काम किया। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सचिव भी रहे। स्वर्गीय जीडी अग्रवाल ने आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग की। इसके बाद रुड़की यूनिवर्सिटी में ही पर्यावरण इंजीनियरिंग के विजिटिंग प्रोफेसर भी थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उत्तरप्रदेश के सिंचाई विभाग में डिजाइन इंजीनियर के तौर पर की। बनारस में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के सान्निध्य में संन्यास दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद जीडी अग्रवाल से स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बन गए।


2008 में पलटाया था सरकारी योजनाओ को 

 

गंगा समेत अन्य नदियों की सफाई को लेकर जीडी अग्रवाल ने पहली बार 2008 में हड़ताल की थी। मांगें पूरी कराने के लिए उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों को अपना जीवन समाप्त करने की धमकी भी दी। वे तब तक डटे रहे, जब तक सरकार नदी के प्रवाह पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को रद्द करने पर सहमत न हुई।  जुलाई 2010 में तत्कालीन पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री जयराम रमेश ने व्यक्तिगत रूप से उनके साथ बातचीत में सरकार के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। साथ ही, गंगा की महत्वपूर्ण सहायक नदी भागीरथी में बांध नहीं बनाने पर सहमति भी जताई।

 

2014 में मोदी के आने पर अनशन रोका 
 

 

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा की स्वच्छता के लिए प्रतिबद्धता दिखाई थी। इसके बाद जीडी अग्रवाल ने आमरण अनशन खत्म कर दिया था। हालांकि, सरकार बनने के बाद से अब तक ‘नमामि गंगे’ परियोजना का सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में अग्रवाल ने 22 जून, 2018 को हरिद्वार के जगजीतपुर स्थित मातृसदन आश्रम में दोबारा अनशन शुरू कर दिया था, 112 दिनों से गंगा सफाई की मांग लेकर आमरण अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का गुरुवार को निधन हो गया। तबीयत बिगड़ने पर सरकार ने ही उन्हें ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया था। वे 86 साल के थे।

 

तपस्वी प्रोफेसर अग्रवाल की आखिरी चिट्ठी के कुछ अंश . . . . 

 

बुधवार दोपहर हरिद्वार प्रशासन ने मुझे मातृ सदन से जबरदस्ती उठा एम्स ऋषि केश में दाखिल करा दिया था। मां गंगाजी के संरक्षण को लेकर मेरी तपस्या के प्रति यहां के डॉक्टर काफी सहयोगी रहे। पेशेवर चिकित्सा संस्थान की तरह डॉक्टरों ने मेरे सामने तीन विकल्प रखे। पहला- मुझे मुंह और नाक से जबरदस्ती खाना दिया जाए। दूसरा- जबरदस्ती आईवी लगाई जाए। तीसरा- अस्पताल में दाखिल न किया जाए। जांच से पता चला कि रक्त में पोटेशियम की मात्रा 1.7 रह गई है। जो 3.5 होनी चाहिए। डॉक्टरों के आग्रह पर मैंने मुंह व आईवी से 500 मिली प्रतिदिन की खुराक पर सहमति जता दी। मेरी तपस्या के प्रति सहयोग के लिए मैं एम्स का शुक्रगुजार हूं।’

 

-प्रो. जीडी अग्रवाल (आखिरी चिट्टी में)

 

 

2013 की भयानक आपदा में 5000 से अधिक लोग मरे थे, उसके बाद कई वैज्ञानिक रिपोर्ट आईं जिनमें कहा गया कि गंगा को बचाने के लिए कई ठोस फ़ैसले लेने होंगे लेकिन किसी पर अमल नहीं हुआ. 2014 में वन और पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई जिसमें कहा गया था कि हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स ने 2013 की आपदा को बढ़ाने में आग में घी का काम किया है. इस रिपोर्ट में गंगा नदी के बेसिन में बन रहे बांधों पर रोक लगाने की सिफ़ारिश की गई. 2016 में ख़ुद गंगा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा कि बांधों से गंगा को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती. इसलिए बांधों पर रोक लगनी ज़रूरी है. लेकिन सरकार ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया.

 

बांधों के अलावा चार धाम परियोजना के नाम पर सड़क के चौड़ीकरण का प्रोजेक्ट गंगा को बर्बाद कर रहा है. गंगा में जहां तहां मलबा गिराया जा रहा है. अंधाधुंध पर्यटन ने पूरे इलाके की पारिस्थितिकी को ख़तरे में डाल दिया है. इसे रोकने के बजाए अनशन तुड़वाने पर ज़ोर रहा. जिसके चक्कर में निगमानंद की जान चली गई. 115 दिन के अनशन के बाद जबरन खाना खिलाने के चक्कर में उनकी जान चली गई. अब प्रो. जी डी अग्रवाल ने अपना जीवन होम किया है. इसी कड़ी में हरियाणा के एक साधु संत गोपालदास ने ऋषिकेश में त्रिवेणी घाट में बुधवार से अन्न जल त्याग दिया है. उन्होंने 24 जून से बद्रीनाथ में अनशन शुरू किया था. प्रशासन उन्हें जबरन एम्स ऋषिकेश ले आया और तब से वो ऋषिकेश में अनशन पर हैं और अब उन्होंने जल भी त्याग दिया है. सवाल है गंगा बचेगी या एक और जान जाएगी.अब गंगा की बात क्यों नहीं हो रही,  विज्ञापन भी नदारद है, मंत्रियों के ट्वीट भी नहीं आ रहे, देश ने महान पर्यावरणविद खो दिया बस खबर बन जाएगी, और समय के गर्भ में समा जाएगी 

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload