'मुक्काबाज़' का डेढ़  दशक से लम्बा संघर्ष

January 11, 2018

विनीत ने अपने लिए खुद लिखी स्क्रिप्ट 

विनीत कुमार सिंह बॉलीवुड में नया चेहरा नहीं हैं. एक अरसे से वो हिंदी और रीजनल सिनेमा का हिस्सा रहे हैं. लेकिन उन्हें पहली बड़ी पहचान मिली थी अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' से. 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में विनीत मनोज बाजपेयी के बेटे और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के बड़े भाई दानिश खान के रोल में थे. रोल बेहतरीन था, लेकिन बहुत छोटा था. पहचान मिली, लेकिन उसके बावजूद विनीत को अपने मन मुताबिक काम नहीं मिला.

 

विनीत बताते हैं कि फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बाद भी उन्हें दूसरे दर्जे के ही किरदार मिल रहे थे. कहीं बेटा, कहीं भाई तो कहीं हीरो का दोस्त. लीड रोल के लिए कोई उन्हें फिल्म का ऑफर ही नहीं दे रहा था. यह विनीत के लिए बहुत फ्रस्ट्रेटिंग था. वो इसलिए क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री में आए हुए विनीत को अब 17 साल हो चुके थे और उन्हें लग रहा था कि उनकी नैया कहीं पार नहीं लग पा रही है.

तो बस, विनीत ने एक रोज फैसला कर लिया. अपने मन मुताबिक फिल्म करने के लिए उन्होंने अपने लिए खुद ही एक फिल्म लिख डाली. ये थी एक मुक्केबाज़ की कहानी. उन्होंने ये कहानी अनुराग कश्यप को सुनाई. अनुराग के साथ विनीत 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'अगली' जैसी फिल्में कर चुके थे. अनुराग ने कहानी सुनी. उन्हें उस कहानी में कोई खास वजन नहीं नजर आया. दरअसल वो कहानी हमारे देश के परिवेश से अलग विदेशी परिपाटी की स्क्रिप्ट थी. जहां एक खिलाड़ी का स्ट्रगल फिल्म 'रॉकी' जैसा था.

लेकिन इस स्क्रिप्ट में एक ऐसी बात थी जिसने अनुराग कश्यप को छू लिया. विनीत की लिखी हुई कहानी में एक स्पोर्ट्समैन सरकारी नौकरी के लिए जद्दोजहद कर रहा था. यह बात अनुराग को उत्तर भारत की जमीन से बहुत जुड़ी हुई दिखी और कहीं न कहीं इसमें विनीत का खुद का भी स्ट्रगल दिखा.


लेकिन अभी भी एक प्रॉब्लम थी. ये कहानी एक मुक्केबाज की थी और विनीत मुक्केबाज नहीं थे. अनुराग ने विनीत के सामने एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि अगर विनीत खुद मुक्केबाज बान जाएं तभी वो इस स्क्रिप्ट पर काम करेंगे. बस फिर क्या था, विनीत ने अपना घर बेचा और थोड़े से सामान के साथ पटियाला पहुंच गए बॉक्सिंग सीखने के लिए. 6 महीने तक देश के सबसे बेहतरीन मुक्केबाजों के साथ एक असली खिलाड़ी की तरह समय बिताने के बाद विनीत लौटे.

विनीत बताते हैं कि ट्रेनिंग का वक्त बहुत मुश्किल था. हर दिन उन्हें भयानक चोटें लगती थीं. 49 बार उनकी पसलियां टूटीं और पूरे चेहरे पर कई घाव लगे. लेकिन अब फिल्म बनकर तैयार है. विनीत का मानना है कि इस फिल्म के लिए 17 सालों का इंतजार सार्थक साबित हुआ.
 

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